"आयुर्वेद: जीवन का विज्ञान और स्वास्थ्य का रक्षण"
◆"आयुर्वेद: जीवन का विज्ञान और स्वास्थ्य का रक्षण"
प्राचीन इतिहास से ज्ञात होता है कि यह एक साइंस ऑफ लाइफ है। आयुर्वेद आयुष्य का वेद है ,यह अथर्ववेद का उपांग है। स्वस्थ एवं दीर्घायु जीवन कैसे जिया जाए उनसिद्धांतों एवं पद्धति से संबंधित शास्त्र है , जिसका मुख्य उद्देश्य मानव का संपूर्ण जीवन सुखमय हो उसका प्रयत्न करना और स्वत व्यक्ति का स्वास्थ रक्षण करना तथा विकारोंका शमन करना है।
हिताहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताहितम्।
मानं च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेदः स उच्यते॥
आयु : कामयमानेनधर्मार्थ सुख साधनम् |
आयुर्वेदो उपदेशेषु विधेय : परमादार : ॥
अर्थात- जिस ग्रंथ में हित आयु , अहित आयु, सुखायु, दुखायु के लिये पथ्यापथ्य का प्रमाण, उनका स्वरूप बताया गया है , वह आयुर्वेदशास्त्र है। इसमें मानव का हित , अहित,सुख,दुख ,धर्म, अर्थ आदि का वर्णन है, अतः सभी को इसका परम आदर करना चाहिए। यह केवल चिकित्सा शास्त्र नहीं है। इसमें एक विशिष्ट पद्धति से जीवन कायापन करना और नित्य आहार, विहार, दिनचर्या, रात्रिचर्या का सम्यक उपयोग करना है। इस संबंधमें विस्तृत विवेचन इस शास्त्र में है।
यह शास्त्र मानव निर्मित नहींयद्यपि इसका स्मरण सर्वप्रथम ब्रह्माजी द्वारा किया गया थातत्पश्चात उसे प्रजापति दक्ष, अश्विनीकुमार, भारद्वाज , आत्रेय, अग्निवेश( चरक), भेल, जतुपर्ण , पराशर, हरित, क्षारपाणि... इत्यादि द्वारा अपनी संहिताओं द्वाराप्रस्तुत किया गया। परन्तु कालांतरमें विदेशी आक्रमणों के कारण कई संहिताएं या तो नष्ट हो गई अथवा दूसरे देशों में ले जाई गई परन्तु आयुर्वेद के अकाट्य सिद्धांतोंके कारण वह आज भी जीवित है और वर्तमान सरकार तथा स्वामी रामदेव,आचार्य बालकृष्ण द्वारा उसका प्रचार प्रसार कर उसे जन जनतक पहुंचाने का उत्तम कार्यकर रहे है।
भारत के प्रथम महामहिम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसादजी अपने लेख "संपूर्ण चिकित्सा पद्धति का जन्मदाता आयुर्वेद" यह मननीय और माननीय है वितरित रूप में कहा है।
चिकित्सा संबंध में आयुर्वेद का एक प्रमुख सिद्धांत है कि "स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणम्"
अर्थात स्वास्थ्य को स्थिर रखना और व्याधियों का नाश करना। तात्पर्य यह है कि चिकित्सा इस प्रकार से होनी चाहिए कि शरीर में विषम भाव को प्राप्त हुई धातुएं सम भाव में आ जाएं जिससे कि शरीर में कोई दूसरा उपद्रव उत्पन्न न हो सके।
"समदोषःसमाग्निश्च समधातु मलःक्रियाः।
प्रसन्नात्मेन्द्रियमनः स्वस्थइतिअभिधीयते॥"
अर्थात् जिसके वातादि दोष और जठराग्निसम हो,धातुओं तथामलों का कार्य यथोचितहोता हो,आत्मा इंद्रियऔर मन प्रसन्न होउसे स्वस्थ कहते है।
मनुष्य का शरीर पंचमहाभूतों से बना है उसमें त्रिदोष (वात,पित्त,कफ) सप्तधातु(रस,रक्त,मांस, मेद,अस्थि,मज्जा,शुक्र ओज) तीन मल(मल,मूत्र,स्वेद) सह सभी साम्यावस्था में होते है तो मनुष्यस्वस्थ रहता है और जब इनमें कुछ कम ज्यादा होता है तो मनुष्यकी प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है और वह रोगी हो जाता है।
"संचय अपरुता दोषः न लभते उत्तरांगतिम् "
अर्थात् दोषों को संचय कालमें ही बाहर निकालनेसे रोग होने कीसंभावना कम हो जाती है |
"दोषा:कदाचित कुप्यन्ति, जिता लंघन पाचनै:।
येतु संशोधनै: शुद्धः न तेषां पुनरुद्भव:"
अर्थात् लंघन पाचन से दोषों का शमन कर उन्हें जीता जाता है,परन्तु कृपथ्य किया गया तो वे फिर से बढ़ सकते है।जबकि संशोधन( वमन ,विरेचन, बस्ती, शिरोविरेचन और रक्तमोक्षण) द्वाराफिर से उद्भव होनेकी संभावना कम होती है।शास्त्रयह कहता है कि स्वस्थ रहने के लिये अहितकर द्रव्य/आहार,विरुद्ध आहार नहीं करना चाहिए। उचित आहार, विहार, दिनचर्या, ऋतुच
र्या, कोष्ठशुद्धी, रात्रीचर्या का ठीक ढंगसे पालन करने से रोगों की उत्पत्ति काम से कम होगी शरीर ऊर्जवान और स्वस्थ रहेगा।
"सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्" ||
इन्हीं शब्दों के साथ मैं मेरे पूज्य पिताश्री और मेरे पूज्य गुरुजी जिन्होंने संपूर्ण जीवन में शुद्ध आयुर्वेद चिकित्सा द्वारा अनेक अनेक लोगों के स्वास्थ की सेवा की ऐसे कर्मठ, मानव मूल्यों को दृष्टिगत रखते हुए, शास्त्र के एक अति अनुशासित निष्णात वैद्य के रूप में जिसने अपने जीवन में न केवल आयुर्वेद शास्त्रका अक्षरशः पालन किया अपितु उसे जिया भी है, जो लोगों की दृष्टि में भगवान् तुल्य हो ऐसे गहन शास्त्रज्ञ एक कुशल नाड़ी विशेषज्ञ आयुर्वेदाचार्य वैद्यराज को अपनी विनम्र और भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं।

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